आर्ष अरुणोदय की उत्तरकथा
स्वप्न निकेतन से निकल, कल्पना के व्योम में विलसते-विहरते आदिजनों ने अवकाश पा लिया , आदिम विलास का उपसंहार घट रहा था , जीवन का काव्योत्सव शिथिल श्रांत हुआ , सोमपात्रों में उल्लसित जीवन कब यथेष्ठ था ? केलि-रसिक-कोविद अब हुए आत्मविद , काया को तीर्थ समझने वाले ज्ञानव्रती हो चले ! आर्ष जीवन मे चेतना के नेपथ्य से हो रहा था मेधा , बुद्धि और विवेक का समवेत प्रवेश , तर्क कर रहा था स्वस्ति वाचन , नान्दि पाठ ! अर्चिस्मान होमकुण्डों में डाली गई समिधाएँ , होमशालाओं में निनादित हुआ पुत्रैष्णा , वित्तैषणा और लोकैषणा के मंत्र ! पूर्व में जो परम चरिष्णुता थी ऋत की अभिव्यक्ति, वही था धर्म ! पर अब इस चरिष्णुता कि सापेक्षता में वर्धिष्णु बुद्धि से हुआ जाता था सब अभिशप्त …… अब थी केवल मार्गभ्रांति , उद्भ्रांति और दिग्भ्रान्ति की त्रासद प्रतीतियाँ ! क्षैतिज चरिष्णुता के समानांतर हो रहा था मेधा का लंबवत ऊर्ध्वसरण ! व्याप्त की अपर्याप्तता से विषादाच्छन्न , वाक् की विपन्नता के विरुद्ध हुए उपक्रमी उद्यमी , नैराश्य में निस्सार वो खोजने लगे भव का सारांश ! कौतुहल ; प्रौढ़-परिपक्व होकर जिज्ञासा हो चले , विस्मय व...