मनुष्यता का अरुणाभ आर्ष उषाकाल
अहो ! आदि वह कौन ?
निसर्ग के संसर्ग में निरखता वह मौन !
कौतूहल में पुलक पुलक रहता कौन ?
अहो ! आदि वह कौन ?
……………………… अस्किनी , वितस्ता , सिंधु, सरस्वती के कुल हुए सभ्यता के सूतिकागृह ! मनुष्यता का
अरुणाभ आर्ष उषाकाल था , काल साक्षी था पशुता के तिरोभाव और मानवता का आविर्भाव का ! सद्य:चेतनालब्ध, आत्मसंज्ञ, पशुता की देहरी लाँघ मनुजता के विराट भव्य जगत में प्रवेश कर घुटुरुन चल रहा था ! बुद्धि के व्योमव्यापी विस्तार में अभी नहीं थे प्रज्ञाघन , सत्य नहीं हुआ था अभी प्रतिष्ठित न ही कोई दृष्टिकोण था स्थापित, थे केवल दृश्य, और दृश्य के दर्शक के भीतर था ……. केवल शुद्ध कौतुहल, जिसका प्रौढ़ होकर विशुद्ध जिज्ञासा होना , नचिकेता होना शेष था ! सूत्रभूत नहीं हुई थी उक्तियाँ , सरल था वाक् का विधान ! कभी द्रुमाश्रयी, कभी कन्दरावासी और कभी छाते थे पर्णकुटिर , बसते थे कुटुम्ब-किल्लोलित साथ साथ ! यथाकाम सोम पी भगाते थे अहेर श्रमजन्य क्लांति-विश्रांति , गाते थे ‘साम’, कहलाते थे उदगाता ! कवि-हृदय अश्वारोही अहेरियों के प्रत्यंचा पर सधे थे जीविका के शिल्प-कलाएँ ! मधु-दिवस और आनन्द-यामिनी में फूट पड़ता था जीवन का मुक्ताहास , अजटिल आदिम सारल्य था भावोद्गार के स्त्रोत ! मारीचिमाली के सुनहरे अंशुजाल और चंद्र किरण के रजताभ इंद्रजाल में बुने जाते थे कल्पना के वितान , अनागत के स्वप्न ! प्रकृति से भय खाये, रीझे, मुग्ध, अघाये वो , नहीं थे देवयाजक , मनुजता से बड़ा विराट होकर कोई नही हुआ था देवता ! था न कोई सम्राट , न ही एकराट, न ही अतिमहनीय विराट , थे केवल यूथेश्वर-यूथेश्वरी ….. सब थे स्वराट ! विलक्षण थी उनकी ईक्षण-ईहा , दृश्यभोग और अद्भुत था प्रकृति के साथ उनका मातृवत साहचर्य ! हास्यप्लुत, हर्षप्लावित जीवन, अकुंठ मनोव्यपार , अरुद्ध व्यंजना , ऐहिक जीवन -सर्ग था आनंदसिद्धि, आनंद साधना ! अज्ञान के निर्दोष, कोमलतम ‘तम’ में तिरते हुए वे दृष्टि उठा नभ की ओर जीवन मे भरते थे सप्तऋषियों का ऋतालोक !
आह! कलुषित कलिकाल में उस युग की कल्पना भी कितनी सुखदाई है.. अप्रतिम, अद्वितीय.. कविवर आपको हार्दिक शुभकामनाएँ..
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