आर्ष अरुणोदय की उत्तरकथा

स्वप्न निकेतन से निकल, कल्पना के व्योम में विलसते-विहरते आदिजनों ने अवकाश पा लिया , आदिम विलास का उपसंहार घट रहा था , जीवन का काव्योत्सव शिथिल श्रांत हुआ , सोमपात्रों में उल्लसित जीवन कब यथेष्ठ था ?
केलि-रसिक-कोविद अब हुए आत्मविद , काया को तीर्थ समझने वाले ज्ञानव्रती हो चले ! आर्ष जीवन मे चेतना के नेपथ्य से हो रहा था मेधा , बुद्धि और विवेक का समवेत प्रवेश , तर्क कर रहा था स्वस्ति वाचन , नान्दि पाठ ! अर्चिस्मान होमकुण्डों में डाली गई समिधाएँ, होमशालाओं में निनादित हुआ पुत्रैष्णा , वित्तैषणा और लोकैषणा के मंत्र ! पूर्व में जो परम चरिष्णुता थी ऋत की अभिव्यक्ति, वही था धर्म ! पर अब इस चरिष्णुता कि सापेक्षता में वर्धिष्णु बुद्धि से हुआ जाता था सब अभिशप्त …… अब थी केवल मार्गभ्रांति , उद्भ्रांति और दिग्भ्रान्ति की त्रासद प्रतीतियाँ ! क्षैतिज चरिष्णुता के समानांतर हो रहा था मेधा का लंबवत ऊर्ध्वसरण ! व्याप्त की अपर्याप्तता से विषादाच्छन्न , वाक् की विपन्नता के विरुद्ध हुए उपक्रमी उद्यमी , नैराश्य में निस्सार वो खोजने लगे भव का सारांश !
कौतुहल ; प्रौढ़-परिपक्व होकर जिज्ञासा हो चले , विस्मय विसर्जित हुई बुद्धि में , विवुद्ध हुए ! ज्ञान यज्ञ में डाल यौवन का हविष्य , भावभरे हुए विवेकवादी ! सुप्त बुद्धि व्यस्त हुई , विवेच्य हुआ विश्व व्यापार !! चेतना का अन्धकाल व्यतीत हुआ, ज्ञान रश्मियों से उद्द्भासित हुआ आर्षलोक ! इंद्रप्रस्थ पर विचार हुआ, यमप्रस्थ पर चर्चाएं हुई , उग्रतर हुए अस्ति -नास्ति के प्रश्न , उठा तर्क का तुमुल निनाद , भाषित हुआ भव त्रिविध त्रास , अन्वेषे जाने लगे भवतीर्ण होने के उपाय , मोक्ष-मुक्ति के पथ !
अनंतर वाक्पति हुए , विद्यापति हुए, विद्योत्तमाएं हुई ! विश्व की कल्याण कामना से प्रेरित श्रुत्योपदिष्ट हुआ पुण्य प्रतिष्ठित , स्थापित हुआ धर्म-रीति-नीति ! चरिष्नु हुए……. पुरोगत…….. सुगत……..तथागत ! विमर्श व्यवस्थित विश्व मे उदित हुए विश्वात्मा, विश्वम्भर , विश्व बंधुत्व और विश्वग्राम के आदर्श ! चेतना की लघिमा हुई अतिक्रांत उदारचेता बन उपनिषदों में में किया प्रज्ञा -पूँजी का निधान !

Comments