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Showing posts from February, 2018

आर्ष अरुणोदय की उत्तरकथा

स्वप्न निकेतन से निकल, कल्पना के व्योम में विलसते-विहरते आदिजनों ने अवकाश पा लिया , आदिम विलास का उपसंहार घट रहा था , जीवन का काव्योत्सव शिथिल श्रांत हुआ , सोमपात्रों में उल्लसित जीवन कब यथेष्ठ था ? केलि-रसिक-कोविद अब हुए आत्मविद , काया को तीर्थ समझने वाले ज्ञानव्रती हो चले ! आर्ष जीवन मे चेतना के नेपथ्य से हो रहा था मेधा , बुद्धि और विवेक का समवेत प्रवेश , तर्क कर रहा था स्वस्ति वाचन , नान्दि पाठ ! अर्चिस्मान होमकुण्डों में डाली गई समिधाएँ , होमशालाओं में निनादित हुआ पुत्रैष्णा , वित्तैषणा और लोकैषणा के मंत्र ! पूर्व में जो परम चरिष्णुता थी ऋत की अभिव्यक्ति, वही था धर्म ! पर अब इस चरिष्णुता कि सापेक्षता में वर्धिष्णु बुद्धि से हुआ जाता था सब अभिशप्त …… अब थी केवल मार्गभ्रांति , उद्भ्रांति और दिग्भ्रान्ति की त्रासद प्रतीतियाँ ! क्षैतिज चरिष्णुता के समानांतर हो रहा था मेधा का लंबवत ऊर्ध्वसरण ! व्याप्त की अपर्याप्तता से विषादाच्छन्न , वाक् की विपन्नता के विरुद्ध हुए उपक्रमी उद्यमी , नैराश्य में निस्सार वो खोजने लगे भव का सारांश ! कौतुहल ; प्रौढ़-परिपक्व होकर जिज्ञासा हो चले , विस्मय व...

मनुष्यता का अरुणाभ आर्ष उषाकाल

अहो ! आदि वह कौन ? निसर्ग के संसर्ग में निरखता वह मौन ! कौतूहल में पुलक पुलक रहता कौन ? अहो ! आदि वह कौन ? ……………………… अस्किनी , वितस्ता , सिंधु, सरस्वती के कुल हुए सभ्यता के सूतिकागृह ! मनुष्यता का अरुणाभ आर्ष उषाकाल था , काल साक्षी था पशुता के तिरोभाव और मानवता का आविर्भाव का ! सद्य:चेतनालब्ध, आत्मसंज्ञ, पशुता की देहरी लाँघ मनुजता के विराट भव्य जगत में प्रवेश कर घुटुरुन चल रहा था ! बुद्धि के व्योमव्यापी विस्तार में अभी नहीं थे प्रज्ञाघन , सत्य नहीं हुआ था अभी प्रतिष्ठित न ही कोई दृष्टिकोण था स्थापित, थे केवल दृश्य, और दृश्य के दर्शक के भीतर था ……. केवल शुद्ध कौतुहल, जिसका प्रौढ़ होकर विशुद्ध जिज्ञासा होना , नचिकेता होना शेष था ! सूत्रभूत नहीं हुई थी उक्तियाँ , सरल था वाक् का विधान ! कभी द्रुमाश्रयी, कभी कन्दरावासी और कभी छाते थे पर्णकुटिर , बसते थे कुटुम्ब-किल्लोलित साथ साथ ! यथाकाम सोम पी भगाते थे अहेर श्रमजन्य क्लांति-विश्रांति , गाते थे ‘साम’, कहलाते थे उदगाता ! कवि-हृदय अश्वारोही अहेरियों के प्रत्यंचा पर सधे थे जीविका के शिल्प-कलाएँ ! मधु-दिवस और आनन्द-यामिनी में फूट पड़...